विशेष पिछड़ी जनजातियों के रीति-रिवाजों में हिन्दू समाज का प्रभाव
घनश्याम दुबे1, सचिन कुमार2
1सह प्राध्यापक, इतिहास विभाग, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर (छ.ग.)।
2सहायक प्राध्यापक, इतिहास विभाग, शासकीय महाविद्यालय जैजैपुर, सक्ती (छ.ग.)।
*Corresponding Author E-mail: thegrtsachin@gmail.com
ABSTRACT:
छत्तीसगढ़ की जनजातियाँ अपनी विशिष्ट संस्कृति और परंपराओं के लिए जानी जाती हैं, लेकिन उनके रीति-रिवाजों और मान्यताओं के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि वे बाहरी समाज, विशेषकर हिंदू समाज के प्रभाव में रही हैं। इनके संस्कारों और परंपराओं में हिंदू समाज की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जो इनके जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रभाव डालती है। विशेष पिछड़ी जनजातियाँ केवल हिंदू समाज से ही नहीं, बल्कि अन्य निकटवर्ती जनजातियों से भी प्रभावित रही हैं। इनके सांस्कृतिक अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि ये जनजातियाँ समय और परिवेश के अनुरूप अन्य जनजातियों की मान्यताओं और परंपराओं को अपनाकर अपनी संस्कृति में बदलाव करती रहती हैं। यह भी देखा गया है कि हिंदू समाज की सांस्कृतिक परंपराओं के उद्भव से पहले ही जनजातियों की विशिष्ट परंपराएँ अस्तित्व में थीं। मानव जीवन की बदलती आवश्यकताओं के अनुसार, दोनों समाजों की संस्कृतियों में परिवर्तन हुआ और इस प्रक्रिया के बाद ही दोनों की संस्कृति के बीच समानताओं और विषमताओं का विश्लेषण आवष्यक है।
KEYWORDS: जनजाति, संस्कृति, परंपरा, हिंदू समाज, परिवर्तन, समानता, विषमता, प्रभाव
भूमिका:
छत्तीसगढ़ की जनजातियाँ अपनी अद्वितीय संस्कृति और परंपराओं के लिए प्रसिद्ध हैं, लेकिन उनके रीति-रिवाजों और मान्यताओं का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि वे बाहरी समाज, विशेष रूप से हिंदू समाज से प्रभावित रही हैं। इनके जीवन और परंपराओं में हिंदू समाज की विभिन्न परंपराओं और संस्कारों का प्रभाव विभिन्न स्तरों पर दिखाई देता है। विशेष पिछड़ी जनजातियाँ न केवल हिंदू समाज बल्कि आसपास की अन्य जनजातियों की मान्यताओं और परंपराओं से भी प्रभावित होती हैं। उनके सांस्कृतिक व्यवहार का विश्लेषण यह दर्शाता है कि वे समय के साथ दूसरी जनजातियों की परंपराओं और विश्वासों को अपनाकर अपनी सांस्कृतिक पहचान में परिवर्तन करती रहती हैं। यह भी महत्वपूर्ण है कि हिंदू समाज की सांस्कृतिक प्राचीनता से पहले भी जनजातियों की विशिष्ट परंपराएँ मौजूद थीं। बदलते समय और मानव जीवन की बदलती आवश्यकताओं के साथ दोनों संस्कृतियों में अनेक बदलाव आए हैं। इन परिवर्तनों के परिणामस्वरूप दोनों समाजों की संस्कृति के बीच समानताओं और भिन्नताओं का अध्ययन किया गया है।
रीति-रिवाज में समानता, विषमता तथा प्रभाव:
प्राचीन हिंदू ग्रंथों के अनुसार, हिंदू संस्कृति में 16 संस्कारों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें मानव अपने जीवनकाल के विभिन्न चरणों और अवसरों पर निभाता है। हालांकि, इन संस्कारों की संख्या को लेकर प्राचीन ग्रंथों में एकमतता नहीं है। पाराषर गृहसूत्र के अनुसार इनकी संख्या 13 है, जबकि आष्वलयन, बौद्धायन, मनुस्मृति, गौतम मुनि और व्यास स्मृति क्रमशः 11, 13, 15, 40 और 16 संस्कारों का उल्लेख करते हैं। वर्तमान समय में भी 16 संस्कारों को मान्यता प्राप्त है। स्वामी दयानंद सरस्वती और पंडित भीमसेन शर्मा ने भी इन्हीं 16 संस्कारों को अनिवार्य माना है।1 अंत्येष्टि संस्कार को कुछ ग्रंथों में अशुभ मानकर उपेक्षित किया गया है, लेकिन यह मानव जीवन का एक आवश्यक संस्कार के रूप में आज भी प्रचलित है। ये 16 संस्कार निम्नलिखित हैंः गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोंन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेधन, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, समावर्तन, विवाह, और अंत्येष्टि।
हिंदू समाज अपनी परंपराओं और मान्यताओं का पालन इन्हीं संस्कारों के माध्यम से करता रहा है। हालांकि, आधुनिक युग में इनमें से कुछ संस्कारों की प्रासंगिकता कम हो गई है, और कुछ में समय के अनुसार परिवर्तन हुआ है। फिर भी, जन्म संस्कार, विवाह संस्कार और अंत्येष्टि संस्कार आज भी सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इन संस्कारों का प्रभाव अन्य समाजों पर भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, और जनजातीय संस्कारों में भी इनका प्रभाव दिखाई देता है।
जन्म संस्कार से संबंधित रीति-रिवाज:
प्राचीन काल में हिंदू समाज में प्रचलित जन्म संस्कारों में समय के साथ बदलाव आया है। हालांकि, इनमें से कुछ संस्कार अब भी परिवर्तित रूप में प्रचलित हैं, जैसे पुंसवन संस्कार, जो वर्तमान में गोद भराई के रूप में जाना जाता है। हिंदू समाज के जन्म संबंधी संस्कारों और पिछड़ी जनजातियों के जन्म संस्कारों के बीच कुछ समानताएँ देखी जा सकती हैं। उदाहरणस्वरूप, हिंदू समाज का सीमंतोंनयन संस्कार, जो शिशु को अनिष्टकारी शक्तियों से बचाने के लिए किया जाता था, उसका एक समान स्वरूप पिछड़ी जनजातियों में भी प्रचलित है। इन जनजातियों में शिशु की रक्षा और उसकी परंपरागत कार्यों में कुशलता की कामना के लिए अपने पूर्वज देवी-देवताओं और अन्य आराध्य देवताओं की पूजा की जाती है। इसके अतिरिक्त, अनिष्टकारी शक्तियों से बचाव के लिए वे जीव आहुति भी प्रदान करते हैं, ताकि शिशु स्वस्थ रहे और भविष्य में अपने कर्तव्यों में निपुण हो सके। इस प्रकार, हिंदू समाज और जनजातीय समाज के संस्कारों में परंपराओं और विष्वासों की गहरी सांस्कृतिक समानताएँ परिलक्षित होती हैं।
जन्म से जुड़े संस्कारों में जातकर्म के तहत नालच्छेदन एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसमें बच्चे की अशुद्धि को समाप्त करने के लिए नाल को काटा जाता है। जनजातियाँ भी अपनी पारंपरिक विधियों का पालन करते हुए प्रसव के लिए घर से बाहर बनी झोपड़ी में यह प्रक्रिया संपन्न करती हैं।2 यहाँ दाई बांस की पट्टी या तीर जैसे पारंपरिक औजारों से नाल काटती है और इसे वहीं जमीन में गाड़ दिया जाता है, ताकि अशुद्धि और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से बचा जा सके। जातकर्म के तहत हिंदू समाज में प्रचलित षष्ठी उत्सव, जिसमें षष्ठी देवी शिशु की रक्षा करती हैं, का एक समान स्वरूप जनजातियों में भी देखने को मिलता है। शिशु की दैवीय रक्षा के लिए इन समुदायों में देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। प्रसन्नता हेतु बलि दी जाती है और समाज या कुल के लोग मिलकर भोज करते हैं।3
जातकर्म के अंतर्गत ही पहाड़ी कोरवा जनजाति में शिशु को जन्म के बाद षष्ठी के दिन चांदी डालकर नहलाने की परंपरा है। इसी तरह बिरहोर जनजाति में प्रसूता को कांसे के बर्तन से पानी पिलाने की परंपरा देखी जाती है। यह परंपराएँ दर्शाती हैं कि ये जनजातियाँ अपने रीति-रिवाजों में हिंदू समाज से प्रेरित होते हुए अपनी विशिष्टता बनाए रखती हैं।
नामकरण संस्कार, जो हिंदू समाज में प्रचलित है, का रूपांतरित स्वरूप जनजातियों में भी पाया जाता है। हिंदू समाज में यह संस्कार विशेष मुहूर्त पर पिता द्वारा बच्चे के कान में नाम लेने के माध्यम से संपन्न होता है। गृहसूत्र और धर्मसूत्रों के आधार पर शिशु का नाम रखा जाता है, जिससे यह कामना की जाती है कि पुत्र यशस्वी और बलशाली बने, जबकि पुत्री सरल, सुंदर और सौम्य हो।4 विशेष पिछड़ी जनजातियों में नामकरण प्रक्रिया अक्सर महीने, दिन, शारीरिक विशेषताओं, देवी-देवताओं या अन्य प्रतीकों पर आधारित होती है। इसके अतिरिक्त, साक्षात्कारों से यह भी ज्ञात हुआ है कि शिशु को अनिष्टकारी शक्तियों से बचाने के उद्देश्य से बालक या बालिका का नाम विचित्र या नकारात्मक रखा जाता है। यह परंपरा इन जनजातियों की सांस्कृतिक विशिष्टता और उनके विश्वासों को दर्शाती है।
वर्तमान में हिंदू समाज में निष्क्रमण संस्कार की परंपरा समाप्त हो चुकी है। विशेष पिछड़ी जनजातियों में भी इस प्रकार का कोई संस्कार नहीं देखा जाता। हालांकि, इन जनजातियों में प्रसूता को तीन महीने तक गृहकार्य और रसोई के कार्य से मुक्त रखा जाता है, और उन्हें जंगलों में जाने की अनुमति नहीं दी जाती।
अन्नप्राशन संस्कार हिंदू समाज के साथ-साथ विशेष पिछड़ी जनजातियों में भी प्रचलित है। इसमें शिशु के छह महीने पूरे होने पर परिवार और संबंधियों को आमंत्रित किया जाता है। इस अवसर पर बच्चे को दूध के अतिरिक्त प्रकृति से प्राप्त भोजन पहली बार खिलाया जाता है। साथ ही, इस आयोजन में शिशु को विभिन्न उपहार प्रदान किए जाते हैं, जो संस्कार के महत्व और समुदाय की परंपराओं को दर्शाते हैं।
जन्म संस्कार के उपरांत के रीति-रिवाज:
कर्णवेधन संस्कार, जो हिंदू समाज में प्रचलित है, उसकी समानता पहाड़ी कोरवा जनजाति के कर्णवेधन संस्कार से देखी जा सकती है। हिंदू समाज में यह संस्कार देवस्थान पर शुभ मुहूर्त में पूजा-अर्चना के बाद कान में छेद करके किया जाता है, और इसे ब्राह्मण समाज में विशेष रूप से अनिवार्य माना जाता है। इसी प्रकार, पहाड़ी कोरवा जनजाति में कर्णवेधन के अवसर पर रिश्तेदारों को आमंत्रित किया जाता है। शिशु के मामा-मामी उसके कान में तेल लगाकर सुई से छेद करते हैं। इसके बाद शिशु को उपहार दिए जाते हैं, और पूरा परिवार मादक द्रव्यों का सेवन कर परंपरागत वाद्ययंत्रों के साथ नाच-गाकर उत्सव मनाता है।
चूड़ाकर्म, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत और समावर्तन जैसे संस्कार वर्तमान समय में हिंदू समाज में व्यापक रूप से नहीं देखे जाते। हालांकि, चूड़ाकर्म और उपनयन का एक रूप, यज्ञोपवीत संस्कार, आज भी प्रचलित है। दूसरी ओर, विशेष पिछड़ी जनजातियों में इन संस्कारों से संबंधित कोई परंपराएं नहीं पाई जातीं, जो उनकी सांस्कृतिक विशिष्टता को दर्शाती हैं।
विवाह संस्कार से संबंधित रीति-रिवाज:
विशेष पिछड़ी जनजातियों में हिंदू धर्म के प्राचीन ग्रंथों में वर्णित विवाह पद्धतियों का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। साथ ही, यह भी कहा जा सकता है कि इन जनजातियों की मौलिक विवाह पद्धतियाँ हिंदू विवाह प्रकारों से पर्याप्त मेल खाती हैं। मनु के अनुसार आठ प्रकार के विवाह की चर्चा की गयी है - 1 ब्राह्म 2 दैव 3 आर्य 4 प्राजापत्य 5 आसूर 6 गंधर्व 7 राक्षस 8 पिशाच।5 उदाहरण के लिए, बैगा जनजाति में मंगनी या चढ़ विवाह, ऊठवा विवाह, चोर विवाह, पैठल विवाह, उढ़रिया विवाह; बिरहोर जनजाति में बिहा और चूरियाही; और पहाड़ी कोरवा जनजाति में बड़ विवाह, ढोल कढ़ही विवाह, बैलकर विवाह और ढुकू विवाह जैसे प्रकार प्रचलित हैं। इनमें हिंदू समाज की विभिन्न विवाह पद्धतियों के रीति-रिवाजों या तत्वों की समानता देखी जा सकती है।
बैगा जनजाति के मंगनी विवाह, बिरहोर जनजाति के बिहा, और पहाड़ी कोरवा जनजाति के बड़ विवाह प्रणाली हिंदू समाज के ब्रह्म विवाह और प्राजापत्य विवाह से मिलती-जुलती हैं। इसी तरह, बैगा समाज के ऊठवा विवाह को राक्षस विवाह के समान माना जा सकता है। गंधर्व विवाह की तरह ही बैगा, पहाड़ी कोरवा और बिरहोर जनजाति में भी वधू अपने निर्णय से भागकर विवाह करती है, जिसे समाजिक मान्यता प्राप्त है; इसके अंतर्गत ढुकू और उढ़रिया विवाह आते हैं।
असुर विवाह की भाँति, इन जनजातियों में वधू मूल्य देकर विवाह करने की परंपरा है। अगर वर वधू मूल्य चुकाने में सक्षम नहीं हो, तो वह वधू के परिवार में काम करके इसे अदा करता है। इसके अलावा, इन जनजातियों में लमसेना नामक एक अद्वितीय विवाह पद्धति पाई जाती है, जो हिंदू समाज की विवाह प्रथाओं से भिन्न है। इसमें वधू का पिता वर से विवाह स्वीकार करने से पहले उसे तीन से पाँच वर्षों तक वधू के परिवार में काम करके अपनी योग्यता साबित करने का अवसर देता है।6
इन विविध विवाह पद्धतियों में उनके सांस्कृतिक विशिष्टता और हिंदू समाज से प्रभावित परंपराओं का सम्मिश्रण स्पष्ट रूप से झलकता है।
हिंदू समाज में पारंपरिक विवाह पद्धतियों में स्त्रियों की इच्छा को अधिक महत्व नहीं दिया जाता था, हालांकि वर्तमान समय में इसमें सुधार देखा गया है। इसके विपरीत, विशेष पिछड़ी जनजातियों में विवाह के निर्णय और वर के चयन में स्त्रियों की इच्छाओं का सम्मान किया जाता है।
बाल विवाह की परंपरा विशेष पिछड़ी जनजातियों में प्राचीन काल से प्रचलित रही है। इन समुदायों में पहले कन्या के लिए विवाह की आयु 12-14 वर्ष और वर के लिए 14-16 वर्ष हुआ करती थी। हालांकि, शिक्षा, जागरूकता, स्वास्थ्य सुविधाओं और संचार के प्रभाव से अब इसमें बदलाव आया है। वर्तमान में कन्या के लिए विवाह की आयु 16-20 वर्ष और वर के लिए 18-22 वर्ष के आसपास हो गई है।
प्राचीन हिंदू समाज की तरह, इन जनजातियों में भी बहुविवाह की प्रथा देखी जाती है। पत्नी की मृत्यु, संतानोत्पत्ति में असमर्थता जैसी परिस्थितियों में बहुविवाह को मान्यता दी जाती है। पहाड़ी कोरवा जनजाति में बहुविवाह का चलन प्राचीन काल से रहा है,7 और बी.आर. रिज़वी ने अपने ग्रंथ में इसका उल्लेख किया है।
हिंदू समाज में विधवा पुनर्विवाह को लेकर कई बाधाएँ रही हैं, लेकिन विशेष पिछड़ी जनजातियों में यह प्रथा प्राचीन समय से चूड़ियाही के नाम से मान्य है। हालांकि, इन जनजातियों में भी विधवाओं का समाज में स्थान सीमित है, लेकिन उन्हें हिंदू समाज की तरह तिरस्कार का सामना नहीं करना पड़ता।
हिंदू विवाह पद्धतियों में विवाह पुरोहित द्वारा मंत्रोच्चार और हवन-पूजन जैसे धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सम्पन्न होता है, जिसमें सप्तपदी, पाणिग्रहण, कन्यादान और प्रदक्षिणा जैसी प्रथाएँ शामिल हैं। दूसरी ओर, जनजातीय विवाह पद्धतियाँ अपेक्षाकृत सरल होती हैं, जहाँ कुल देवी-देवताओं और समुदाय के आराध्य देवताओं का पूजन किया जाता है, और समाज के बुजुर्गों के आशीर्वाद से विवाह संपन्न होता है।
हिंदू विवाह परंपराओं के विपरीत, बैगा जनजाति की विवाहित स्त्रियाँ सिंदूर का उपयोग नहीं करतीं और न ही वे नाक में छिद्र कराती हैं। इन जनजातीय विवाह पद्धतियों और रिवाजों की विशिष्टता उनके सांस्कृतिक ढाँचे को प्रदर्शित करती है।
मृतक संस्कार से संबंधित रीति-रिवाज:
मनुष्य जीवन का अंतिम संस्कार अंत्येष्टि संस्कार है, जिसमें कई पारंपरिक रिवाजों का पालन किया जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों और गृहसूत्रों के अनुसार, मृत्यु के बाद पार्थिव शरीर को अग्नि के माध्यम से दाह संस्कार द्वारा समर्पित किया जाता है। मृत्यु के पश्चात पूरे कुल-परिवार को तेरहवें दिन तक अशुद्ध माना जाता है। अशुद्धि समाप्ति के लिए ब्राह्मण भोज का आयोजन किया जाता है। इन 13 दिनों में कई धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, जैसे तीसरे दिन तीज नहावन, जिसमें परिवार के सदस्य मुंडन करवाते हैं। इन दिनों के दौरान परिवार रसोई में स्वयं भोजन नहीं बनाता। दसवें दिन दशकर्म अनुष्ठान और पिंडदान के बाद, तेरहवें दिन ब्राह्मण भोज कर अंत्येष्टि संस्कार को पूर्ण किया जाता है।7
विशेष पिछड़ी जनजातियों में अंत्येष्टि संस्कार कुछ हद तक हिंदू परंपरा के समान है, परंतु इसमें महत्वपूर्ण अंतर भी है। ये जनजातियाँ मृतक के शरीर को दाह संस्कार के बजाय प्रकृति की गोद में भूमि में दफनाते हैं। साथ ही, मृतक के पारलौकिक जीवन की कामनाओं के प्रतीक रूप में उसकी प्रिय वस्तुएँ भी साथ दफन की जाती हैं। हिंदू समाज और जनजातीय समुदायों की अंत्येष्टि संस्कार में यह बड़ा अंतर है कि हिंदू समाज में महिलाएँ श्मशान नहीं जातीं, जबकि जनजातीय समुदायों की महिलाएँ अंतिम संस्कार के लिए श्मशान जाती हैं।
अन्य परंपराओं के संदर्भ में, जनजातियों में भी मृतक के कुल-परिवार को अशुद्ध माना जाता है। तीसरे दिन तीजनहावन और दसवें दिन दशकर्म नहावन जैसे रिवाज होते हैं, जिन्हें जनजातियाँ अपनी स्थानीय बोली में भिन्न नामों से पुकारती हैं। अंत में, ब्राह्मण भोज के स्थान पर समुदाय के लोगों को भोज कराया जाता है, जिससे अशुद्धि समाप्त मानी जाती है। इस दौरान जनजातियाँ भी स्वयं भोजन नहीं बनातीं।
पहाड़ी कोरवा जनजाति में मृतक संस्कार के तहत यह विशेष परंपरा रही है कि जिस घर में मृत्यु होती है, उसे तोड़ दिया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि कोई अनिष्टकारी शक्ति, भूत-प्रेत या अन्य समस्याएँ उत्पन्न न हों।8 हालांकि, आधुनिक समय में जागरूकता, आवास की कमी, और सरकारी योजनाओं के प्रभाव के कारण इस परंपरा में धीरे-धीरे कमी आई है। साथ ही, आधुनिकता और सामाजिक बदलावों ने इस प्रथा को कम प्रचलित बना दिया है।
निष्कर्ष:
हिंदू समाज के प्रभाव का विशेष पिछड़ी जनजातियों पर अध्ययन करने से पता चलता है कि हिंदू धर्मग्रंथों, स्मृतियों और गृहसूत्रों में वर्णित 16 संस्कारों का उल्लेख उनके संस्कारों में भी देखा जा सकता है। हिंदू संस्कृति के ये 16 संस्कार आज भी विधि-विधान में अल्प परिवर्तनों के साथ प्रचलित हैं। विशेष पिछड़ी जनजातियों के संस्कारों में हिंदू संस्कृति के कई संस्कारों की समानता दिखाई देती है, जिनमें गर्भाधान, पुंसवन, सीमांतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, कर्णवेधन, विवाह और अंत्येष्टि संस्कार मुख्य हैं। हालांकि, 16 में से अन्य संस्कारों का इन जनजातियों के समाज में कोई उल्लेख या प्रभाव स्पष्ट रूप से नहीं मिलता। इन संस्कारों के विधान सामुदायिक और स्थानीय विविधताओं के साथ अक्सर समरूप ही प्रतीत होते हैं, जो परस्पर प्रभाव का संकेत देते हैं। मनुस्मृति में हिंदू धर्म के अनुसार आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है। इनमें से ब्रह्म विवाह को छोड़कर अन्य विवाह पद्धतियाँ विशेष पिछड़ी जनजातियों की विवाह पद्धतियों से समानता रखती हैं। हालांकि, जनजातीय समाज की कुछ विवाह प्रथाएँ हिंदू समाज में अप्रचलित या रूढ़िवाद के विपरीत रही हैं, जैसे लमसेना विवाह (सेवा विवाह) और चुरीयाही (विधवा विवाह)। ये अनूठी प्रथाएँ इन जनजातियों की सांस्कृतिक पहचान और उनके विशिष्ट सामाजिक ढाँचे को दर्शाती हैं।
संदर्भ:
1. डॉ. रेनु यादव: संस्कारों की संख्या तथा वर्तमान युग में उनकी प्रासंगिकता, IJSR 2017; 3(4): 152-155
2. रॉय, एस. सी., द बिरहोर्स ए लिटिल-नोन जंगल ट्राइब्स ऑफ छोटा नागपुर, मेन इन इंडिया ऑफिस, रांची, 1978, पृष्ठ 106
3. श्रीवास्तव, वी.के., द पहाड़ी कोरवास: सोषियो इकनॉमिक कंडीशन एंड देयर डेवलपमेंट, सोनाली पब्लिकेशन, दिल्ली, 2007 पृष्ठ 16
4. मनुस्मृति 2/30
5. मनुस्मृति 3/21
6. सिन्हा, अनिल कुमार, छत्तीसगढ़ की आदिम जनजातियाँ, नार्दर्न बुक सेंटर, नई दिल्ली, 2006, पृष्ठ 144
7. अलंग, डॉ. संजय, छत्तीसगढ़ की अनुसूचित जनजातियाँ, जन विज्ञान समिति, तुलारामबाग, इलाहाबाद, 2016, पृष्ठ 31
8. बौधायन गृह्यसूत्र 1/43
9. श्रीवास्तव, वी.के., द पहाड़ी कोरवास: सोषियो इकनॉमिक कंडीशन एंड देयर डेवलपमेंट, सोनाली पब्लिकेशन, दिल्ली, 2007 पृष्ठ 17
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Received on 20.03.2025 Revised on 07.04.2025 Accepted on 22.04.2025 Published on 04.06.2025 Available online from June 07, 2025 Int. J. Ad. Social Sciences. 2025; 13(2):69-74. DOI: 10.52711/2454-2679.2025.00011 ©A and V Publications All right reserved
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